अमृत काल में अर्थव्यवस्था पर इतराने जैसे हालात नहीं
अमृत काल में अर्थव्यवस्था पर इतराने जैसे हालात नहीं आजादी के पिचहत्तरवें साल के इस अमृत वर्ष में देश की तमाम व्यवथाओ का एक विहंगम जायजा लेने के क्रम में जब हम अपनी अर्थव्यवस्था पर नजर डालते हैं तो इस कालखंड में एक गहरी विभाजन रेखा दिखाई पड़ती है । यह विभाजन रेखा है वर्ष 1991 में शुरू हुई नयी आर्थिक नीति की। यानी भारतीय अर्थव्यवस्था के पिछले पिचहत्तर साल के काल को एक तो 1991 के पूर्व के काल और दूसरा 1991 के बाद के काल के रूप में जाना जा सकता है । 1991 के पूर्व का काल जहां साम्यवादी व समाजवादी नीतियों विचारधाराओंं और कार्यक्रमों से प्रभावित और संचालित था वही 1991 के बाद का काल बाजारीकरण, उदारीकरण, निजीकरण व भूमंडलीकरण के चौपाए पर ज्यादा निवेश, ज्यादा विकास दर, ज्यादा राजस्व और कल्याणकारी कार्यक्रमों पर ज्यादा सरकारी बजट आबंटन की नीतियों से प्रभावित था। कहना होगा कि आजादी के बाद ना केवल विचारधारा के समकालीन परिवेश और फैशन की वजह से बल्कि देश की आर्थिक परिस्थितियों और जरूरतों के हिसाब से सरकार प्रायोजित नियोजित व्यवस्था का प्रादूर्र्भाव हुआ। यह एक ऐसी व्यवस्था थी जिसमें सरकारी विभाग, सरकारी उपक्रम, सरकारी योजना, सरकारी निवेश, सार्वजनिक निर्माण व उत्पादन व सार्वजनिक वितरण प्रणाली का ही बोलबाला था।उस समय ये ...

