Economy India
हिंदी अर्थलेख

अमृत काल में अर्थव्यवस्था पर इतराने जैसे हालात नहीं

मनोहर मनोज
आजादी के  पिचहत्तरवें  साल के  इस  अमृत वर्ष में  देश की तमाम व्यवस्थाओं  का एक विहंगम जायजा लेने के क्रम में जब हम अपनी अर्थव्यवस्था पर नजर डालते हैं तो इस कालखंड  में एक गहरी विभाजन रेखा दिखाई पड़ती है । यह विभाजन रेखा है   वर्ष   1991 में शुरू हुई नयी आर्थिक नीति की। यानी भारतीय अर्थव्यवस्था के  पिछले  पिचहत्तर साल के  काल को एक तो  1991  के पूर्व के  काल और दूसरा  1991 के बाद के  काल के रूप में जाना जा सकता है ।  1991   के पूर्व का काल जहां साम्यवादी व समाजवादी नीतियों विचारधाराओंं और कार्यक्रमों से प्रभावित और संचालित था वही  1991   के बाद का काल बाजारीकरण, उदारीकरण, निजीकरण व भूमंडलीकरण के चौपाए पर ज्यादा निवेश, ज्यादा विकास दर, ज्यादा राजस्व और कल्याणकारी कार्यक्रमों  पर ज्यादा सरकारी बजट आबंटन  की नीतियों से प्रभावित था। कहना होगा कि आजादी के बाद ना केवल विचारधारा के समकालीन परिवेश और फैशन की वजह से बल्कि देश की आर्थिक परिस्थितियों और जरूरतों के हिसाब से सरकार प्रायोजित नियोजित व्यवस्था का प्रादूर्र्भाव हुआ। यह एक ऐसी व्यवस्था थी जिसमें सरकारी विभाग, सरकारी उपक्रम, सरकारी योजना, सरकारी निवेश, सार्वजनिक निर्माण व उत्पादन व सार्वजनिक वितरण प्रणाली का ही बोलबाला था।उस समय ये  बात भी थी देश का निजी महकमा अर्थव्यवस्था में  निवेश, उत्पादन, तकनीक व विपणन के मामले में अपनी प्रमुख भूमिका निभाने में  सक्षम  भी   नहीं था। लेकिन ये भी सही है की  समाजवादी व  साम्यवादी   विचारधारा से लबरेज हमारी राजनीति और आर्थिक नीतियां निजी क्षेत्र को निर्बाध वातावरण प्रदान करने से भी  कतराती रही। उस दौरान की  नीतियों के जरिये भारत की अर्थव्यव्था में   विकास के जो  सोपान  हासिल किये  उसमे  हम यह उल्लेख कर सकते हैंं की 1950  के दशक में भारत में बड़े बड़े भारी उद्योगों की स्थापना व नदी घाटी परियोजनाओंं का श्रीगणेश  हमारी अर्थव्यवस्था की  प्रमुख हलचल बनी। 1960  के दशक में खाद्यान्न की आत्मनिर्भरता हासिल करने की छटपटाहट ने  देश में हरित क्रांति का उदघोष किया । 1970  के दशक में देश समाजवादी विचारधारा के चरमोतकर्ष  पर पहुुंंच कर बैंक ों का राष्ट्रीयकरण, देश के बड़े रजवाड़े व रियासतों को उनके भारत की संप्रभुता में विलय की एवज में मिलने वाले  राजस्व हरजाना यानी प्रिवी पर्स को समाप्त करना, आर्थिक गतिविधियोंं में सरकार के एकाधिकार को और पुखता कर निजी आर्थिक गतिविधियों को अनेकानेक लाइसेंस परमिट व कोटा प्रणाली में जकड़ने जैसे कदम उठाये गए  दिया । इसके उपरांत देश में स्थापित राजनीतिक व आर्थिक एकाधिकारी प्रवृतियों ने भ्रष्टाचार के अनेकानेक दरवाजे खोलने शुरू कर दिए । 1980  के बाद से देश में आर्थिक नीति व निर्णय प्रक्रिया में थोड़े उदारवादी कदमों की डोज मिलनी शुरू हुई । इसी दौर में सूचना प्रोद्योगिकी युग की शुरूआत होती है। 1990  के दशक तक देश अनेकानेक आर्थिक संकटों के दुश्चक्र में फंस जाता है तब इसी समय देश अर्थव्यवस्था की  एक बिल्कुल एक नयी नीतिगत व संस्थागत रिजीम में प्रवेश करता है। फिर इसके उपरांत  भारत की अर्थव्यवस्था की एक दूसरी ऐतिहासिक  पारी की शुरूआत होती है जिसमे निवेश को सर्वोपरि स्थान मिलता है। वह निवेश  चाहे वह देश के निजी उपक्रम करें या विदेश की बड़ी बड़ी बहुराष्ट्रीय कपनियों के मार्फत किया जाए।
1991 के पूर्व की आर्थिक रिजीम हो या  राजनीतिक दलों केे घोषणा पत्रों, राजनेताओं की पब्लिक मीटिगों, सरकार की कैबिनेट मीटिंगों के फैसले हों ये  सभी समाजवादी व सामयवादी योजनाओं व घोषणाओं से पटी रहती थीं जिसमे गरीबोंं, बेरोजगारों निरक्षरों और दलितों के लिए बड़ी बड़ी बातों के साहित्य की प्रचुरता तो होती थी। पर होता क्या था इन योजनाओं के के लिए आबंटित राशि अत्यल्प थी क्योंकि सरकार के पास पर्याप्त राजस्व संग्रहण नहीं  होता था, क्योंकि देश की विकास दर कभी वास्तविक रूप से तीन फीसदी से उपर नहीं गयी । इसी को भारतीय अर्थव्यवस्था का हिंदू विकास दर माना  गया। दूसरा सरकार निर्धनोंं व दलितों के लिए जो कल्याणकारी योजनाएं शुरू करती थी उसे क्रियान्वित करने वाली नौकरशाही के भ्रष्ट, कामचोरी और आलसी रवैये  असल में गरीबों का बिल्कुल भी भला नहीं कर पाती थी। 1991  के पहले भारत के अर्थशास्त्री गरीबी निवारण की रिस रिस कर विकास पहुंचने की  नीति यानि ट्रिकल डाउन थ्योरी  की बात करने में शर्मिंदगी  महसूस करते थे। परंतु  समाजवादी व सामयवादी रिजीम मे  गरीबी निवारण की योजनाओं के क्रियान्वन का हश्र ऐसा हुआ की 1991   के बाद निर्धनता निवाण की इसी ट्रिकल डाउन थ्योैरी को एक बेहद व्यावहारिक कदम माना गया। क्योंकि  1991  के बाद देश की अर्थव्यवस्था में बदला पूंजीगत व वित्तीय निवेश का माहौल अर्थव्यवस्था में  तीन दशक तक अनवरत पांच या पांच फीसदी से उपर विकास दर सुनिश्चित करता रहा  है। इस दौरान  सरकार का राजस्व कम से कम दस गुना बढता है और फिर  गरीबी निवाण व सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों तथा सर्वप्रमुख आर्थिक बुनियादी संरचना व  मानव विकास के बजट आबंटन  में यह व्यापक बढोत्तरी का भी प्रतीक बनता है।
यह ठीक है कि  1991 के उपरांत   पूंजीपतियों की हर जगह हर समय चर्चा होती है। परन्तु इसी की वजह से गांवों के करोड़ो खेतीहर मजदूर जो दशकों से ग्रामीण भारत में  रोजाना   ढाइ किलों  अनाज पर श्रमयापन कर रहे थे उन्हें अब  देश के महानगरों, औद्योगिक केन्द्रों में व्यापक पैमाने पर खींच लाया ।  और देखते ही देखते भारत के लाखों गांव जो खेतीहर अर्थव्यवस्था की अनुत्पादकता व आमदनी की अपर्याप्तता में जकडे हुए थे वहां एक नयी मनीआर्डर इकोनामी का आगमन होता है। वही दूसरी तरफ इन्ही इलाकों के  पढे लिखे व मध्यवर्गी जमात को इस भूमंडलीकृत युग में  राष्टीय व अंतरराष्ट्रीय वर्क फोर्स मार्केट में नए  अवसरों की बरसात होती है जो  भारतीय अर्थव्यवस्था को अब एक रिमेटेंन्स इकोनामी में तब्दील कर देती  हैं।
1991  के बाद हमने मान लिया कि जब हमारी औद्योगिक अर्थव्यवस्था, कारपोरेट अर्थव्यवस्था और कुल मिलाकर देश की राष्ट्रीय विकास दर बढेगी तो उसका असर रिसरिसकर गरीबों तक पहुंचेगा और उन्हें रोजगार, मजदूरी व नये श्रम कानूनों के जरिये नये नए  अवसर  प्राप्त होंते रहेंगे । यानी पहले गरीबों के लिए भाषण थे साहित्य थे, पर अवसर व सशक्तीकरण नहीं था। पर जब  देश की विकास दर बढा  तो उसका असर गरीबों पर पड़े बिना नहीं रहा ।
नयी आर्थिक नीति की  नरसिंह मनमोहन सिंह की जोड़ी ने  शुरूआत  की।  बाजपेयी सरकार उसे उत्कृष्टता की ओर ले गई पर यूपीए ने इस नीति पर राजनीतिक लोकलुभावनवाद का तड़क़ा देने के क्रम में इसकी मूल दिशा से भटकी।  नरेन्द्र मोदी ने अपने शुरूआती काल में इसे फिर संभाला पर बाद में इस मोदी  सरकार की  तीन बड़ी भूलों  नोटबंदी, जीएसटी की अपूर्ण तैयारी, देशबंदी व कृषि उत्पादों की मूल्य सुरक्षा से इनकार की वजह से इस नयी आर्थिक नीति के मूमेंटम में बड़ा  झटका लगा। बाद में कोविड महामारी ने इस हालात को तो चारो खाने पस्त कर दिया। अभी पिछले दो साल से कोविड महामारी से जहां हमारी अर्थव्यवस्था दुनिया में सबसे ज्यादा  ऋणात्मक दर पर चली गई थी। वही कोविड महामारी के उपरांत हमारी अर्थव्यवस्था समूची दुनिया में अब सबसे ज्यादा विकासमान हालात में पहुंच गयी है।

 अमृत काल के अवसर पर भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ी खबर यही है कि ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था के आकार पर अपनी बढत लेकर यह दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी  अर्थव्यवस्था बन गई। पर हम सबको मालूम है कि हमारी जनसंखया के हिसाब से भारतीय अर्थव्यवस्था का मौजूदा आकार ना केवल बेहद अपर्याप्त है बल्कि प्रगति व विकास के अनेकानेक मानकों पर हमे अगले तीन दशक कड़ी परीक्षा में अपना सफर पूरा करना पड़ेगा। हमारे सामने टेलीकाम, आईटी, राजमार्ग और यहां तक कि उर्जा सुरक्षा व उपलब्धता के क्षेत्र में मिली सफलता मील के पत्थर की तरह है। लेकिन हमे अर्थव्यवस्था के अनेकानेक सेक्टरों पर बडी ही संभल कर, बिना किसी पोलीटिकल एडवेंचरिज्म के एक विशुद्ध व वैज्ञानिक तरीके से नीतिगत, निर्णयगत व नियमन पूर्ण तरीकें से निजी व सरकारी दोनो क्षेत्रों की साझेदारी व प्रतियोगी स्वरूप को संचालित करना होगा।

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